मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारागार में अमर शहीद खुदीराम बोस के शहादत दिवस पर अधिकारियों और परिजनों ने उनकी सेल, फांसी स्थल और प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, ११ अगस्त
अमर शहीद खुदीराम बोस के शहाद दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी 11 अगस्त की प्रातः लगभग 4:30 बजे आयुक्त, तिरहुत प्रमंडल, गिरिवर दयाल सिंह, पुलिस उप-महानिरीक्षक, तिरहुत प्रक्षेत्र, चन्दन कुशवाहा, जिला पदाधिकारी, कुमार गौरव, वरीय पुलिस अधीक्षक, कान्तेश कुमार मिश्रा, अपर समाहर्त्ता (राजस्व), प्रशांत कुमार, अनुमंडल पदाधिकारी, पूर्वी आनंद उत्सव, काराधीक्षक युसूफ रिजवान, उपाधीक्षक एवं अन्य कारा “कर्मी सहित जिले अन्य वरीय पदाधिकारियों तथा बंगाल से आये खुदीराम बोस के परिजनों द्वारा अमर शहीद खुदीराम बोस को याद करते हुए सेल प्रकोष्ठ (जहाँ खुदीराम बोस को संसीमित किया गया था), फाँसी स्थल, आखिरी रात वाले सेल एवं कारा प्रांगण स्थित प्रतिमा पर नम आंखों से श्रद्धा-सुमन अर्पित किया गया। अमर शहीद खुदीराम बोस एक क्रान्तिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे, जो बंगाल के मिदनापुर जिले के निवासी थे। वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के बाद उन्होंने क्रान्तिकारी समिति के साथ मिलकर लगभग- 18 वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ काफी बढ़-चढ़कर भाग लिया तथा ब्रिटिश न्यायाधीश डगलश किंग्सफोर्ड, जो बंगाल से स्थानांतरित होकर मुजफ्फरपुर जिले में जिला जज के रूप में आये थे। ब्रिटिश न्यायाधीश किंग्सफोर्ड के द्वारा बंगाल निवासी के उपर किये गये बर्बरता के लिए खुदीराम बोस ने किंग्सफोर्ड की हत्या करने का निर्णय लिया, इसी क्रम में 30 अप्रैल 1908 को ब्रिटिश न्यायाधीश किंग्सफोर्ड के बग्गी पर बम फेंका गया, संयोगवश किंग्सफोर्ड उस बग्गी में नहीं थे, बग्गी में सवार दो महिला की मृत्यु हो गई, इसी हत्या के आरोप में 01 मई 1908 को खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर इस कारा में, संसीमित किया गया, जहाँ तीन माह से अधिक दिनों तक कारा के सेल में संसीमित रखने के बाद 11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को फॉसी दी गई थी। भारत के सबसे स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक, खुदीराम बोस को 11 अगस्त 1908 को मात्र 18 वर्ष की आयु में मुजफ्फरपुर जेल में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फांसी दी गई थी। हर साल की तरह इस साल भी मुजफ्फरपुर के शहीद खुदीराम बोस केद्रीय कारा परिसर को फूलों और रोशनी से विशेष रूप से सजाया गया। अधिकारियों और परिजनों ने तड़के सुबह जेल के अंदर बने उस विशेष सेल (प्रकोष्ठ) जहां उन्हें रखा गया था, ऐतिहासिक फांसी स्थल और उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और दो मिनट का मौन रखकर उनके सर्वोच्च बलिदान को याद किया। महज 18 साल, 8 महीने की उम्र में गीता हाथ में लेकर मुस्कुराते हुए उन्होंने फांसी के फंदे को गले लगा लिया, जिसके बाद वे देश के युवाओं के लिए राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गए।






