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इंडियन इकोनॉमिक एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित इकोनॉमिक एसोसिएशन ऑफ बिहार के 23वें वार्षिक अधिवेशन के दूसरे दिन ‘भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ और आर्थिक विचार: सतत विकास के लिए पारंपरिक ज्ञान’ विषय पर पैनल चर्चा आयोजित

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, १० मई

महिला शिल्प कला भवन (MSKB) कॉलेज में इंडियन इकोनॉमिक एसोसिएशन (IEA) के सहयोग से आयोजित इकोनॉमिक एसोसिएशन ऑफ बिहार (EAB) के 23वें वार्षिक अधिवेशन के दूसरे दिन ‘भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ और आर्थिक विचार: सतत विकास के लिए पारंपरिक ज्ञान’ विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा आयोजित की गई। यह दो दिवसीय कार्यक्रम (9-10 मई 2026) ‘विकसित भारत @ 2047: समावेशी और सतत विकास के लिए रोडमैप’ मुख्य विषय पर केंद्रित था। पैनल चर्चा की अध्यक्षता करते हुए प्रो.कन्हैया आहूजा, उपाध्यक्ष (उत्तर), आईईए सह अर्थशास्त्र संकाय के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश नें इस बात पर जोर दिया कि धर्म (नैतिक कर्तव्य) और अहिंसा (अहिंसा) जैसे पारंपरिक ज्ञान, सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने के लिए एक मानक ढांचा प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, कृषि में पारंपरिक प्रथाएं (जैविक खेती) और जल प्रबंधन (सीढ़ीदार कुएं) शून्य भूख (एसडीजी 2) और स्वच्छ जल (एसडीजी 6) से संबंधित लक्ष्यों का प्रत्यक्ष रूप से समर्थन करते हैं। पैनल चर्चा के मध्यस्थ डॉ.रवीन्द्र के. ब्रह्मे महासचिव, आईईए सह प्रोफेसर और डीन तथा अर्थशास्त्र में एसओएस, पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर। छत्तीसगढ नें पश्चिमी लाभ-केंद्रित मॉडलों की तुलना भारतीय दृष्टिकोण से की, जो अर्थ (धन) और धर्म (नैतिक व्यवस्था) के बीच संतुलन स्थापित करता है। उन्होंने तर्क दिया कि संगठनात्मक प्रदर्शन के प्रति यह “सर्व-समावेशी” दृष्टिकोण अधिक टिकाऊ व्यावसायिक प्रथाओं और कर्मचारियों के कल्याण की ओर ले जाता है। पैनल चर्चा के पैनलिस्ट डॉ.सुवरांशु पान, संयुक्त सचिव, आईईए सह प्रिंसिपल, कुल्टी कॉलेज,काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल नें कहा कि पश्चिमी आर्थिक प्रभुत्व से पहले मौजूद व्यापार, शासन और संसाधन आवंटन के स्वदेशी प्रतिमानों को पुनः प्राप्त करके “भारतीय मानसिकता को उपनिवेशवाद से मुक्त” करने की आवश्यकता है। पैनल चर्चा के पैनलिस्ट डॉ.आलोक प्रताप सिंह, छात्र कल्याण विभाग के डीन (डीएसडब्ल्यू) बीआरए बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर एनईपी 2020 को एक ऐतिहासिक नीति के रूप में उद्धृत करते हुए कहा की यह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ सांस्कृतिक रूप से गहरी जड़ों वाले कार्यबल का निर्माण करने के लिए आधुनिक पाठ्यक्रम में आईकेएस को एकीकृत करती है। डॉ.सिंह द्वारा वाराणसी के हथकरघा उद्योग के पुनरुद्धार और जैविक खेती में सिक्किम के नेतृत्व जैसे वास्तविक दुनिया के उदाहरणों को प्रदर्शित किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आईकेएस किस प्रकार आत्मनिर्भर उद्योगों को बढ़ावा दे सकता है। पैनल चर्चा के पैनलिस्ट डॉ. आलोक कुमार पांडे, एसोसिएट प्रोफेसर, एकीकृत ग्रामीण विकास केंद्र, सामाजिक विज्ञान संकाय,बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश, डॉ.दलीप कुमार पूर्व परियोजना अधिकारी,एनसीएईआर (राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद) नई दिल्ली, प्रो.उमरतन यादव, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष,अर्थशास्त्र विभाग, बुंदेलखंड कॉलेज, झांसी, मध्य प्रदेश एवं डॉ.एम. दिलीप आनंद, समन्वयक दक्षिण, आईईए सह प्राध्यापक अर्थशास्त्र विभाग, प्रेसिडेंसी कॉलेज, चेन्नई, तमिलनाडु नें कहा की आईकेएस कोई स्थिर अवशेष नहीं है, बल्कि अवलोकन और प्रयोग पर आधारित एक गतिशील, अनुकूलनीय प्रणाली है। हालाँकि इसके प्रभावी होने के बावजूद, बड़े पैमाने पर पुनरुद्धार में अपर्याप्त दस्तावेज़ीकरण और औद्योगीकरण के कारण स्थानीय परंपराओं के क्षरण जैसी बाधाएं हैं। 2047 तक एक विकसित भारत के लिए प्राचीन ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक ढांचों के साथ जोड़ना आवश्यक है। पैनल चर्चा के प्रतिवेदक डॉ.ध्रुव कुमार सिंह, सहायक प्राध्यापक, वाणिज्य विभाग, रामश्रेष्ठ सिंह महाविद्यालय, चोचहाँ, मुजफ्फरपुर, बी आर ए, बिहार विश्वविद्यालय नें  पैनल रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा की चर्चा इस बात पर केंद्रित थी कि भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत समकालीन वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए एक मानक ढांचा कैसे प्रदान कर सकती है। पैनलिस्टों ने तर्क दिया कि पारंपरिक ज्ञान और परंपराएं (आईकेएस) केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं बल्कि एक गतिशील, अनुकूलनीय प्रणाली है जो भारत को नैतिक और सतत विकास में वैश्विक नेता के रूप में स्थापित कर सकती है। सर्वसम्मति इस बात पर बनी कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और स्थानीय स्तर पर आधारित समग्र विकास के लिए स्वदेशी ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक ढाँचों का “संतुलित एकीकरण” आवश्यक है। आम सहमति यह है कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक प्रौद्योगिकी से जोड़ना एक न्यायसंगत और लचीला भविष्य का निर्माण करता है। आईकेएस को एक बहु-विषयक ढाँचे के रूप में अपनाकर, भारत का उद्देश्य शेष विश्व को सतत जीवन के लिए एक सभ्यतागत मॉडल प्रस्तुत करना है। पैनल चर्चा सत्र में आईइए के मुख्य संयोजक और ईएबी के संस्थापक सचिव डॉ.अनिल कुमार ठाकुर, सम्मेलन के संयोजक डॉ.राकेश कुमार सिंह, आईईए के संयुक्त सचिव डॉ.एस. नारायणन, ईएबी के सचिव डॉ.राजेश बीआरएयू के कुलानुशासक प्रो.रवीन्द्र कुमार चौधरी, पूर्व कुलसचिव प्रो.संजय कुमार, प्रो.सी.के.पी. शाही, प्रो.के.एन. यादव, प्रो.बी.पी. चंद्रमोहन, डॉ.पूनम कुमारी, डॉ.अंग्रेज सिंह राणा, डॉ.कुमारी मनीषा, डॉ.बालाकान्त शर्मा, डॉ.दानिश सब्बीर, डॉ.अविनाश कुमार, डॉ.विकास कुमार शांडिल्य, डॉ.प्रदीप कुमार, डॉ.अनिल कुमार, डॉ.चिन्मय प्रकाश, डॉ.बिनोद कुमार दत्त, डॉ.अनीश चन्द्र मिश्रा सहित बड़ी संख्या में प्रतिभागी शिक्षक और शोधार्थी उपस्थित थें.  

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