बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परंपरा का बहुविषयक चरित्र” विषय पर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग, दर्शनशास्त्र विभाग और विद्या भारती के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
ज्ञान परंपरा के समृद्ध विरासत को फैलाना, इसका अध्ययन करना और युवाओं को इसके प्रति जागरूक करना हम सबों का दायित्व- प्रो.दिनेश चंद्र राय, कुलपति

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, १८ अप्रैल
बीआरए बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) के सीनेट हॉल में “भारतीय ज्ञान परंपरा का बहुविषयक चरित्र” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग, दर्शनशास्त्र विभाग और विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान, उत्तर बिहार प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। बी.आर अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) के कुलपति प्रो.दिनेश चंद्र राय ने भारतीय ज्ञान प्रणाली पर केंद्रित दो दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की। इस अवसर पर प्रख्यात शिक्षाविद के.एन. रघुनंदन ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की, और विशेष पैनल ने भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन और आधुनिक शिक्षा में इसके एकीकरण पर चर्चा की। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि सह विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय संगठन मंत्री एन रघुनंदन ने इसे तर्क आधारित, समावेशी और समग्र बताया और भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा समग्र, तर्क आधारित और समावेशी है। यह हमारी समृद्ध बौद्धिक विरासत है। यह ज्ञान परंपरा वास्तव में सृष्टि केंद्रित है, जो वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिन: के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। यह मानव को प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा मानती है। ज्ञान, विज्ञान और आध्यात्म अलग नहीं, बल्कि एक ही सृष्टि का हिस्सा है। ज्ञान परंपरा की भारतीय अवधारणा केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक विकास को भी शामिल करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत बच्चों के समग्र विकास के लिए पंचकोश सिद्धांत को लागू किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो.दिनेश चंद्र राय ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समग्रता में देखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि गाय, गंगा और जमीन हमारी समृद्ध संस्कृति के परिचायक हैं। कुलपति प्रो.राय ने भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) को अकादमिक पाठ्यक्रम में शामिल करने और इसके व्यावहारिक उपयोग पर चर्चा करते हुए शैक्षणिक गुणवत्ता और भारतीय संस्कृति के संगम पर जोर दिया। कुलपति नें कहा की इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के आलोक में स्वदेशी ज्ञान को आधुनिक शैक्षणिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ना और विश्व बंधुत्व के दर्शन को फैलाना है। प्रो.राय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समग्रता में देखने की जरूरत है। इसका उद्देश्य पूरे विश्व में विश्व बंधुत्व के दर्शन को फैलाना है। ज्ञान परंपरा के समृद्ध विरासत को फैलाना, इसका अध्ययन करना और युवाओं को इसके प्रति जागरूक करना हम सबों का दायित्व बनता है। उन्होंने विश्वविद्यालय मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. रजनीश कुमार गुप्ता की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित कर शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी रेखा खींचने का काम किया है। क्षेत्रीय संगठन मंत्री विद्या भारती उत्तर पूर्व क्षेत्र के ख्याली राम ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में मातृभाषा को ज्ञान, संस्कृति और अस्मिता का मूल आधार माना गया है। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सचिव प्रो.सच्चिदानंद मिश्रा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हजारों वर्षों से अवलोकन, प्रयोग और तर्क पर आधारित वैज्ञानिक सोच की परिचायक है। विद्या भारती के प्रो.रमन त्रिवेदी ने विद्या भारती उच्च शिक्षा के कार्य योजनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। विषय प्रवेश कराते हुए विश्वविद्यालय मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ.रजनीश कुमार गुप्ता ने भारतीय ज्ञान परंपरा के बहुविषयक चरित्र पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दो दिनों तक चलने वाले इस संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा के दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार, तकनीकी उन्नति के साथ संबंध, भारतीय ज्ञान परंपरा में नेतृत्व, प्रबंधन एवं प्रशासन में भूमिका के साथ-साथ ज्ञान परंपरा का शिक्षा एवं शिक्षा शास्त्र से संबंध पर विस्तार से चर्चा होनी है। कार्यक्रम में मंच संचालन डॉ. तूलिका सिंह एवं धन्यवाद विज्ञापन डॉ.निखिल रंजन प्रकाश ने किया। संगोष्ठी में प्रो.राजकिशोर शर्मा, प्रो.आनंद प्रकाश और प्रो.श्यामल किशोर, प्रो.विपिन कुमार राय, प्रो.कनुप्रिया, प्रो.मधु सिंह, प्रो.अमिता शर्मा, डॉ.मो.अमानुल्लाह, प्रो.राजीव कुमार, डॉ.अमर बहादुर शुक्ला सहित बड़ी संख्या में शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्त्ता उपस्थित थें.







