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महेश प्रसाद सिन्हा साइंस कॉलेज और भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय भाषा परिवार और भाषाई एकता” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार आयोजित

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, ०४ जनवरी

महेश प्रसाद सिन्हा साइंस कॉलेज और भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय भाषा परिवार और भाषाई एकता” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार का उद्घाटन बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.दिनेश चंद्र राय द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य अतिथियों का सम्मान प्राचार्य  डॉ.राजीव कुमार एवं अन्य सदस्यों द्वारा पुष्प गुच्छ, मोमेंटो और शॉल देकर सम्मानित किया गया। कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि हम राष्ट्र निर्माण के ‘स्वर्णिम काल’ में हैं, जहाँ भाषाई एकता भारत की बहुभाषी संस्कृति को जोड़ने में अहम भूमिका निभा रही है। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. (डॉ.) मो.जहांगीर वारसी, भाषा विज्ञान विभाग, एएमयू, अलीगढ़ सह अध्यक्ष, लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया ने भारतीय भाषा समिति द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन किया। अपने संबोधन में उन्होंने पाणिनी रचित “अष्टाध्यायी” की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत विश्व में सर्वाधिक भाषाएं जानने वाला देश है। उन्होंने संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी बताया और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना में स्थानीय भाषाओं के महत्व को रेखांकित किया। इस सत्र का मंच संचालन महाविद्यालय के डॉ.आशुतोष तथा धन्यवाद ज्ञापन महाविद्यालय के डॉ.नवीन कुमार ने किया I प्रथम तकनीकी सत्र  में पूर्व परीक्षा नियंत्रक डॉ. मनोज कुमार ने भारतीय भाषाओं के इतिहास पर चर्चा की और बताया कि कैसे पिछले 200 वर्षों में विदेशी आक्रमणकारियों के कारण हमारी भाषाओं की स्थिति दयनीय हुई। लंगट सिंह महाविद्यालय के भोजपुरी विभागाध्यक्ष डॉ.जयकांत सिंह ‘जय’ ने मंच की प्रदर्शन पट्टिका पर अंग्रेजी के प्रयोग पर खेद जताया और अपनी भाषा के प्रति गौरव महसूस करने की अपील की।  ललित नारायण तिरहुत महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. ममता रानी ने वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी के महत्व को स्वीकारते हुए सुझाव दिया कि हिंदी को अब राजभाषा के साथ-साथ राष्ट्रभाषा घोषित कर देना चाहिए। उन्होंने बताया कि नई शिक्षा नीति (NEP-2020) के आने से हिंदी और मातृभाषाओं के उपयोग को बढ़ावा मिला है। सेमिनार में शोध पत्र भी प्रस्तुत किए गए, जिसमें डॉ. कृष्ण पासवान, R.C.S. कॉलेज, मन्झौल द्वारा प्रस्तुत शोध पत्र के मुख्य बिंदुओं को संकलित किया गया. डॉ.राजेश्वर कुमार ने कहा कि संस्कृत भाषा ने सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसे भारतीय संस्कृति की आधारशिला के रूप में देखा गया, जिसका अपना एक विशिष्ट सांस्कृतिक महत्व है। इस सत्र की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ.राजीव कुमार ने किया I इस सत्र का मंच संचालन महाविद्यालय के डॉ. अरविन्द कुमार सिंह ने किया I द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता पूर्व कुलपति डॉ. अमरेन्द्र कुमार यादव ने की। अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. यादव ने शिक्षा, विशेषकर तकनीकी शिक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार उच्च शिक्षा पर खर्च बढ़ाती है, तो हम गरीब राज्यों को विकसित कर एक स्वच्छ और सुंदर राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे। डॉ.प्रमोद कुमार ने ‘भारतीय ज्ञान परम्परा’ और ‘भारतीय संस्कृति’ के अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमारी भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे ज्ञान और संस्कारों की संवाहक हैं। डॉ.श्रीप्रकाश पाण्डेय ने राष्ट्र निर्माण के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा और भाषाई उपयोगिता पर बल दिया। डॉ.ज्योति नारायण सिंह ने अपने वक्तव्य में सारी भाषाओं में अन्योन्याश्रय संबंधों पर जोर दिया I उन्होंने लोकल, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के महत्व पर बल दिया साथ ही उन्होंने विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में भाषा की भूमिका को बताया I इस सत्र का मंच संचालन महाविद्यालय के डॉ. अरविन्द कुमार सिंह ने किया I कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को पुष्प गुच्छ, मोमेंटो और शाल देकर सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में दर्जनों प्रतिभागियों ने भाग लिया और कार्यक्रम की समाप्ति के उपरांत सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र दिया गया और डॉ. वंदना श्रीवास्तव के द्वारा रचित भोजपुरी कला के बहाने पुस्तक का विमोचन किया गया I मौके पर बड़ी संख्या में महाविद्यालय के शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मचारी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे I

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