विश्व कल्याण के लिए सांस्कृतिक एकता और आदि शंकराचार्य के दार्शनिक सिद्धांत प्रासंगिक- प्रो.कनुप्रिया

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, २० अप्रैल
लंगट सिंह महाविद्यालय में आयोजित आदि शंकराचार्य जयंती संगोष्ठी में प्राचार्य प्रो.कनुप्रिया ने सांस्कृतिक एकता को विश्व कल्याण का आधार बताया। उन्होंने आदि शंकराचार्य के दर्शन को वर्तमान समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि सांस्कृतिक एकता से ही विश्व कल्याण संभव है। कार्यक्रम में अद्वैत वेदांत और सार्वभौमिक एकात्मता पर चर्चा की गई। ‘आचार्य शंकर: सार्वभौमिक एकात्मता का ब्रह्मघोष’ विषयक यह संगोष्ठीएलएस कॉलेज के दर्शनशास्त्र एवं संस्कृत विभाग द्वारा शंकराचार्य जयंती पूर्व संध्या पर आयोजित थी. इस अवसर पर प्राचार्या नें विश्व कल्याण के लिए सांस्कृतिक एकता और आदि शंकराचार्य के दार्शनिक सिद्धांतों को प्रासंगिक बताया। प्राचार्या नें ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (पूरा विश्व एक परिवार है) की भावना पर ज़ोर देते हुए कहा की जब दुनिया की विभिन्न संस्कृतियाँ एक-दूसरे के मूल्यों का सम्मान करती हैं और साझा विरासत से जुड़ती हैं, तभी वैश्विक शांति और मानवता का कल्याण संभव है। विभिन्न सभ्यताओं के बीच बातचीत से गलतफहमियाँ दूर होती हैं। खान-पान और भाषा अलग हो सकती है, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ पूरी दुनिया में एक समान हैं। दूसरों की परंपराओं को अपनाना नहीं, बल्कि उनका सम्मान करना ही सांस्कृतिक एकता की असली नींव है। भारतीय संस्कृति की एकता और शंकराचार्य के दर्शन पर केंद्रित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता सह पूर्व विभागाध्यक्ष, डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय प्रो.अंबिका दत्त शर्मा ने अद्वैत वेदांत को ‘स्वराज’ का असली दर्शन बताया। उन्होंने कहा कि आचार्य शंकर द्वारा चारों पीठों की स्थापना दरअसल ‘वेद राज्य’ की परिकल्पना को साकार करने का प्रतीक था। इससे पूर्व, कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ संगीत विभाग के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत दीप प्रज्वलन एवं मधुर स्वागत गीत से हुआ, जिसके बाद दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार ने अतिथियों का औपचारिक अभिनंदन किया। कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विभाग के डॉ.परमेश तिवारी ने तथा धन्यवाद ज्ञापन दर्शनशास्र विभाग की डॉ.दीपिका कुमारी ने किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो.निखिल रंजन प्रकाश, प्रो.सरोज कुमार वर्मा, डॉ.पयौली, डॉ.रमेश विश्वकर्मा, डॉ. अनुराधा पाठक एवं डॉ. पूजा कुमारी ने भी अपने विचार रखे। मौके पर प्रो.राजीव झा, प्रो.जयकांत सिंह, प्रो. एस.आर चतुर्वेदी, डॉ.अर्धेंदु, डॉ.अर्चना ठाकुर, डॉ.त्रिपदा भारती, डॉ.शशिकांत पाण्डेय, डॉ.राजीव कुमार मौजूद रहे।





