मिथिला की विद्वत परंपरा न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए ज्ञान का एक अक्षय स्रोत रही है- प्रो.दिनेश चन्द्र राय, कुलपति, बीआरएबीयू
संस्कृत भारती और डॉ.रामजी मेहता आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में 'मिथिलाया: पाण्डित्यपरम्परा' विषयक संगोष्ठी आयोजित

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, २३ मार्च
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.दिनेश चन्द्र राय ने डॉ.रामजी मेहता आदर्श आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में आयोजित ‘मिथिलाया: पाण्डित्यपरम्परा’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में मिथिला की समृद्ध विद्वत परंपरा और संस्कृत के वैश्विक महत्व पर सारगर्भित विचार साझा किए। कुलपति प्रो.राय ने मिथिला की विद्वत परंपरा को एक राष्ट्रीय मंच पर रेखांकित करते हुए कहा की मिथिला प्राचीन काल से ही न्याय, मीमांसा और दर्शन का केंद्र रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कैसे इस धरती ने महान विद्वानों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया है। संस्कृत को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान और विज्ञान का भंडार बताते हुए इसके वैश्विक प्रासंगिकता पर विचार साझा किए। आधुनिक समय में इस समृद्ध पांडित्य परंपरा को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया। कुलपति नें कहा की आदर्श संस्कृत महाविद्यालय जैसे संस्थान इस तरह की संगोष्ठियों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक और शैक्षणिक जड़ों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मिथिला की विद्वत परंपरा न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए ज्ञान का एक अक्षय स्रोत रही है। न्याय, मीमांसा और व्याकरण के क्षेत्र में मिथिला के विद्वानों (जैसे उदयनाचार्य, शंकर मिश्र और वाचस्पति मिश्र) का योगदान अतुलनीय है। कुलपति प्रो.राय नें कहा की यहाँ की धरती ने ‘शास्त्रार्थ’ की उस जीवंत परंपरा को सहेजा है, जिसने भारतीय दर्शन को नई दिशा दी। संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, भाषा विज्ञान (Linguistics) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के लिए भी एक आदर्श संरचना प्रदान करती है। इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और संस्कृत के माध्यम से वैश्विक ज्ञान-सत्रों में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करने का कार्य करते हैं। संगोष्ठी में अन्य वक्ताओं ने रेखांकित किया कि मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि ज्ञान और दर्शन की एक जीवंत परंपरा है। प्राचीन काल से ही यहाँ के विद्वानों ने न्याय, मीमांसा और व्याकरण जैसे कठिन विषयों में विश्व का नेतृत्व किया है। देश भर से आए संस्कृत विद्वानों ने शोध पत्रों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि मिथिला की तर्क पद्धति (न्याय शास्त्र) आज भी आधुनिक शोध और तार्किक चिंतन का आधार है। यह आयोजन इस दिशा में एक बड़ा कदम है कि कैसे हमारी प्राचीन विरासत को आधुनिक संदर्भों में पुनः स्थापित किया जा सकता है।





