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जिलाधिकारी की अध्यक्षता में विकास कार्यों की समीक्षा, पेयजल आपूर्ति व मेडिकल कचरा प्रबंधन पर सख्त निर्देश

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, १४ मार्च

जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन की अध्यक्षता में मुजफ्फरपुर समाहरणालय सभागार में सरकार द्वारा संचालित विकास एवं जनकल्याणकारी योजनाओं की अद्यतन स्थिति एवं प्रगति की प्रखंडवार समीक्षा की गई। बैठक में विभिन्न विभागों के अधिकारियों को कार्यों के समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए। जिलाधिकारी ने कहा कि सरकार की योजनाओं का लाभ आम लोगों तक सुगमता से पहुंचे, इसके लिए सभी अधिकारी पूरी जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ कार्य करें। बैठक में गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था पर विशेष चर्चा की गई। जिलाधिकारी ने निर्देश दिया कि सभी प्रखंडों में खराब पड़े चापाकलों और नल-जल योजनाओं की सूची प्रखंडवार तैयार की जाए। उन्होंने उप विकास आयुक्त को इस कार्य की नियमित समीक्षा कर सभी खराब चापाकलों एवं नल-जल योजनाओं को शीघ्र ठीक कराने का निर्देश दिया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो चापाकल बिल्कुल पुराने और जीर्ण-शीर्ण हो चुके हैं, उन्हें हटाकर नई व्यवस्था सुनिश्चित की जाए ताकि गर्मी के मौसम में आम लोगों को पेयजल की किसी प्रकार की समस्या का सामना न करना पड़े। जिलाधिकारी ने लोक सेवा अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आम नागरिकों के आवेदनों का समयबद्ध एवं पारदर्शी तरीके से निष्पादन सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उन्होंने सभी प्रखंडों और अंचलों में आरटीपीएस काउंटर को सक्रिय रखने तथा नियमानुसार प्राप्त आवेदनों का समय पर निष्पादन करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही सभी आवेदनों की प्रविष्टि संबंधित पोर्टल पर अनिवार्य रूप से दर्ज करने को कहा, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और नागरिकों को सेवाएं समय पर उपलब्ध हो सकें। उन्होंने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को कार्यालय में उपस्थित रहकर आम जनता से संवाद करें और उनकी समस्याओं तथा शिकायतों की सुनवाई कर उनका समुचित समाधान सुनिश्चित करें। जिलाधिकारी ने कहा कि जिला, नगर निकाय, प्रखंड, अंचल और पंचायत स्तर पर प्राप्त शिकायतों का त्वरित निष्पादन किया जाए। इसके साथ ही मुख्यमंत्री जनता दरबार से प्राप्त मामलों का भी शीघ्र निपटारा कर उसकी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। बैठक में आंगनबाड़ी केंद्रों में पेयजल की व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। जिलाधिकारी ने पीएचईडी के कार्यपालक अभियंता को निर्देश दिया कि जिले के शेष बचे हुए आंगनबाड़ी केंद्रों को भी नल-जल योजना से आच्छादित किया जाए। इसके लिए जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (आईसीडीएस) को सभी बाल विकास परियोजना पदाधिकारियों से प्रतिवेदन प्राप्त कर शीघ्र रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया। भूमि से संबंधित मामलों की समीक्षा करते हुए जिलाधिकारी ने म्यूटेशन, परिमार्जन और भूमि मापी के मामलों पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि इन मामलों के लंबित रहने से आम लोगों को काफी परेशानी होती है, इसलिए इनका समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित किया जाए। बैठक के दौरान मेडिकल कचरे (बायो-मेडिकल वेस्ट) के अनुचित निपटान से होने वाले खतरों पर भी विस्तृत चर्चा की गई। जिलाधिकारी ने कहा कि मेडिकल कचरे का यत्र-तत्र फेंका जाना न केवल पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है, बल्कि इससे मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उन्होंने सभी संबंधित अधिकारियों को पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ मेडिकल कचरे के वैज्ञानिक एवं नियमसम्मत प्रबंधन को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।बैठक में बताया गया कि अस्पतालों, क्लीनिकों, पैथोलॉजी लैब, पशु चिकित्सा केंद्रों तथा टीकाकरण केंद्रों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में बायो-मेडिकल कचरा निकलता है। यदि इसका उचित तरीके से निपटान नहीं किया जाए तो यह संक्रमण और प्रदूषण का बड़ा कारण बन सकता है। संक्रमित सुई, ब्लेड, ड्रेसिंग सामग्री तथा रक्त और शारीरिक द्रव से सने पदार्थ कई गंभीर रोगों के प्रसार का माध्यम बन सकते हैं। जिलाधिकारी ने बताया कि खुले में मेडिकल कचरा जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और जहरीली गैसें वातावरण में फैलती हैं। वहीं रासायनिक अपशिष्ट मिट्टी और भूजल को प्रदूषित कर दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति पहुंचाते हैं। प्लास्टिक आधारित मेडिकल कचरा लंबे समय तक पर्यावरण में बना रहता है और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। इसके अलावा खुले में फेंका गया मेडिकल कचरा जानवरों द्वारा इधर-उधर फैलाया जा सकता है, जिससे संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है। बैठक में यह भी बताया गया कि दवाओं के अवशेष पर्यावरण में पहुंचकर जीवाणुओं में एंटीबायोटिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकते हैं, जो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है। जिलाधिकारी ने सभी सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों को सरकारी नियमों और मानकों का शत-प्रतिशत अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। उन्होंने सिविल सर्जन को जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों का निरीक्षण कर सूची तैयार करने तथा चिन्हित संस्थानों को 48 घंटे के भीतर कचरे के उचित निपटान का निर्देश देने को कहा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। मेडिकल कचरे के सुरक्षित संग्रहण और परिवहन के लिए रंग-कोडेड डस्टबिन-पीला, लाल, नीला और सफेद के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। जिलाधिकारी ने कहा कि प्रत्येक प्रकार के कचरे को निर्धारित रंग के कंटेनर में ही संग्रहित किया जाना चाहिए, ताकि उसका वैज्ञानिक तरीके से उपचार और निपटान संभव हो सके। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि किसी भी परिस्थिति में मेडिकल कचरे को अनधिकृत रूप से न तो फेंका जाए और न ही जलाया जाए। ऐसा करने पर संबंधित संस्थान के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। नगर निकायों को नियमित निगरानी कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को समय-समय पर निरीक्षण कर नियमों के अनुपालन की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया। जिलाधिकारी ने कहा कि मेडिकल कचरे के प्रभावी प्रबंधन के लिए केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कर्मियों को प्रशिक्षित करना और आम लोगों को जागरूक करना भी आवश्यक है। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों और सफाई कर्मियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने तथा आम जनता के बीच जागरूकता अभियान चलाने पर बल दिया। बैठक में जिलाधिकारी श्री सेन ने कहा कि मेडिकल कचरे का वैज्ञानिक एवं नियमसम्मत प्रबंधन जनस्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य संस्थानों, नगर निकायों और आम नागरिकों की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। सभी हितधारकों के समन्वित प्रयास से ही जिले में मेडिकल कचरे के सुरक्षित और प्रभावी प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था स्थापित की जा सकती है और स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण का निर्माण संभव है।

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