कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम पर उन्मुखीकरण सह वृहत कार्यशाला आयोजित
हर संस्थान में सशक्त शिकायत समिति बने, महिलाओं को वर्कप्लेस पर मिले भयमुक्त कार्य वातावरण- सुब्रत कुमार सेन, जिलाधिकारी

ध्रुव कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर, बिहार, २१ फ़रवरी
महिलाओं की सुरक्षा के विधिक पक्ष को सुदृढ़ करने तथा कार्यस्थलों पर लैंगिक भेदभाव को दूर कर सुरक्षित, सम्मानित एवं गरिमापूर्ण वातावरण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मुजफ्फरपुर समाहरणालय सभागार में “कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013” पर एक वृहत उन्मुखीकरण सह कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह अधिनियम महिलाओं को सुरक्षित, सम्मानजनक एवं भयमुक्त कार्यस्थल उपलब्ध कराने की दिशा में एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कानूनी कदम माना जाता है। कार्यशाला का उद्देश्य विभिन्न विभागों के पदाधिकारियों, कर्मचारियों, शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों, निजी प्रतिष्ठानों, आंगनबाड़ी कर्मियों तथा स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को अधिनियम के प्रावधानों से विस्तारपूर्वक अवगत कराना तथा उसके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अधिकारी, महिला कर्मचारी एवं जीविका समूह की प्रतिनिधियां उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का उद्घाटन जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। अपने संबोधन में जिलाधिकारी ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश, बढ़ती महिला कार्यभागीदारी तथा कार्यक्षेत्रों के निरंतर विस्तार के साथ इस कानून की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ गई है। आज महिलाएं केवल पारंपरिक कार्यालयों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कारखानों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों, निजी प्रतिष्ठानों, गैर-सरकारी संगठनों तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे विविध कार्यक्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन और संस्थानों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। जिलाधिकारी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान करता है। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का लैंगिक भेदभाव या यौन उत्पीड़न न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराना प्रत्येक संस्था की कानूनी ही नहीं, नैतिक जिम्मेदारी भी है। महिला सशक्तिकरण के व्यापक परिप्रेक्ष्य में जिलाधिकारी ने बताया कि जिले में लगभग 9 लाख दीदियां स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जीविका से जुड़ी हुई हैं। इन समूहों ने महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पूरे बिहार में सर्वप्रथम मुजफ्फरपुर जिले में हरी सभा कल्याणी चौक पर कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जहां सुरक्षित, सम्मानित एवं गरिमापूर्ण वातावरण में महिलाओं को आवास की सुविधा मिल रही है। यह पहल कार्यरत महिलाओं को सहयोग और सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जिलाधिकारी ने सभी विभागाध्यक्षों एवं संस्थानों के प्रतिनिधियों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने कार्यालयों में आंतरिक शिकायत समिति का विधिवत गठन सुनिश्चित करें तथा उसकी नियमित बैठकें आयोजित करें। उन्होंने कहा कि केवल औपचारिक रूप से समिति बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके सदस्यों को विधिक प्रावधानों, जांच प्रक्रिया, लैंगिक संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक पहलुओं के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है। प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जिलाधिकारी ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि शिकायत प्राप्ति से लेकर निपटान तक की प्रक्रिया समयबद्ध होनी चाहिए। प्रत्येक संस्था को वार्षिक प्रतिवेदन तैयार कर उच्चाधिकारियों को उपलब्ध कराना चाहिए। कार्यालय परिसरों में अधिनियम से संबंधित सूचना पट्ट अनिवार्य रूप से प्रदर्शित किए जाएं, ताकि सभी कर्मचारी अपने अधिकारों और कर्तव्यों से अवगत रहें। महिला कर्मचारियों के लिए परामर्श एवं सहायता तंत्र विकसित किया जाए तथा आवश्यकतानुसार कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि अधिनियम की प्रभावशीलता तभी सुनिश्चित होगी जब पुरुष एवं महिला दोनों कर्मचारी इसके प्रति जागरूक होंगे और कार्यस्थल को गरिमापूर्ण बनाए रखने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। सभी सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों तथा निजी प्रतिष्ठानों में समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। जीविका समूहों की महिलाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस कानून की जानकारी व्यापक स्तर पर पहुंचाई जाएगी, ताकि महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सजग रहें और आवश्यकता पड़ने पर शिकायत दर्ज कराने में संकोच न करें। जिलाधिकारी ने अपने संबोधन में कहा कि प्रशासन की प्राथमिकता है कि प्रत्येक महिला को ऐसा कार्य वातावरण मिले, जहां वह बिना भय, संकोच या असुरक्षा की भावना के अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सके। महिला सशक्तिकरण केवल आर्थिक योजनाओं से संभव नहीं है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, कानूनी संरक्षण और समान अवसर की गारंटी से ही समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। कार्यशाला में आईसीडीएस की परियोजना निदेशक अंकिता कश्यप ने अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अधिनियम के अंतर्गत किसी भी प्रकार का अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक व्यवहार, अश्लील टिप्पणी, अनुचित स्पर्श, धमकी, अपमानजनक संकेत, आपत्तिजनक ईमेल, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल माध्यम से की गई अनुचित हरकत भी यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून केवल प्रत्यक्ष व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल और आभासी माध्यमों पर होने वाले उत्पीड़न को भी समान गंभीरता से देखता है। उन्होंने बताया कि यदि किसी संस्था में 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, तो वहां आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य है। इस समिति में एक वरिष्ठ महिला कर्मचारी को अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए तथा बाहरी सदस्य के रूप में किसी सामाजिक कार्यकर्ता या विधिक विशेषज्ञ को शामिल करना आवश्यक है। छोटे संस्थानों के लिए जिला स्तर पर स्थानीय शिकायत समिति की व्यवस्था की गई है, ताकि असंगठित क्षेत्र की महिलाएं भी न्याय प्राप्त कर सकें। श्रीमती कश्यप ने शिकायत प्रक्रिया की जानकारी देते हुए कहा कि शिकायत दर्ज होने के पश्चात निर्धारित समयसीमा के भीतर जांच पूरी करना अनिवार्य है। जांच प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और संवेदनशील होनी चाहिए। पीड़िता की गोपनीयता की रक्षा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और किसी भी स्तर पर उसकी पहचान उजागर करना दंडनीय है। अधिनियम में यह प्रावधान भी है कि जांच के दौरान पीड़िता को कार्यस्थल परिवर्तन, विशेष अवकाश या अन्य अंतरिम राहत प्रदान की जा सकती है, ताकि वह बिना किसी दबाव के न्यायिक प्रक्रिया में भाग ले सके। दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, आर्थिक दंड या सेवा समाप्ति तक की अनुशंसा की जा सकती है साथ ही संस्थान की ओर से अधिनियम का अनुपालन न करने पर नियोक्ता के विरुद्ध भी दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं है, बल्कि कार्यस्थलों पर सम्मानजनक और सुरक्षित वातावरण का निर्माण करना है। कार्यशाला में प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि वे अपने-अपने संस्थानों में अधिनियम के प्रावधानों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करेंगे और लैंगिक भेदभाव मुक्त कार्यसंस्कृति के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। जिला जनसम्पर्क अधिकारी प्रमोद कुमार नें बताया की प्रशासन की यह पहल जिले में महिला अधिकारों की सुरक्षा, गरिमा की रक्षा और सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं दूरगामी कदम के रूप में देखी जा रही है।





